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قصة : سيدي أحمد البراح

بوابة القصر الكبير | بتاريخ 20 أبريل, 2018 | قراءة

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عبد المالك العسري

…سمع  صوت طرقات متلاحقة  على  الباب ، نهض  متثاقلا ، كانت  الطرقات تزداد  ، بحث  عن  عصاه التي  يتكأ عليها،ترجى الطارق  أن  يمهله  قليلا ،  توقفت  الطرقات  ، فتح  الباب  فإذا  به  أمام  شاب يبادره  بالسؤال إن  كان  هو   ” احمد  المسكيني ” وحين  أجابه بنعم  ،ناوله  ورقة  وطلب  منه توقيعها ،  تناول  الورقة  وسال  عن  فحواها متدرعا  أنه  لا  يحمل  نظارتيه ،  أجابه  الشاب ،  الأمر يتعلق  بمحضر  تبليغ  حكم  بالإفراغ للمنزل  الذي يقطنه   صادر  عن المحكمة  ،  تفاجأ متسائلا  عن المدعي  ،  أجابه  الشاب  انها  نظارة  الا  وقاف والشؤون  الإسلامية  استصدرت  حكما  بالإفراغ  لعدم أداء واجبات الكراء منذ   سنوات  .

وقع  الورقة  بيد  مرتعشة  تناول  نسخة  منها ،  نبهه  الشاب ان  لديه اجل استئناف  الحكم  في ظرف  خمسة  عشر يوما  ،  انسحب  الشاب ،  ظل  يتأمل  الورقة ،  دخل  وأغلق  بابه  جلس على  مضربته جال  ببصره أرجاء  البيت  الذي  احتضنه  منذ  خمسة  وأربعين  سنة منذ  الشهر  الأول  الذي تزوج المرحومة  حليمة والتي  لقيت  ربها قبل  سنتين

سيدي  احمد  البراح  ، هكذا  كانوا  ينادونه ، احمد  المسكيني  لم  تكن  إلا  في  الوثائق  الرسمية  ،  بصوته  الأجش  كان  يتقدم  ليالي  جيلالة  بزاوية  مولاي  عبد القادر  الجيلالي  ،يتقدم  العلالمية  حاملي  أعلام  الزاوية  ،  يفتتح  الليلة  ،  لم  يكن  سيدي  احمد  يدخل  الحضرة  انما كان حريصا  على  إنجاح ليلة ” الحيرة  ”  ويتأهب  للتدخل كلما   وصلت  الليلة  ذروتها  ويعمل  على  إخراج من  استبد به  الجذب  وسقط مغشيا  عليه  ، هكذا  بخبرته  يستطيع  أن  يتكهن  متى يسقط هذا  او  تلك

سيدي  احمد   البراح  مارس  الدلالة  في  سوق  الغزل  والغطايين ملتزما  باخلاق  واعراف الدلالة

قانعا   بما تذره  عليه  ، الدوائر  الرسمية التي  كان  يحلو  له  ان  يسميها ” المخزن  السعيد ” تستعين   به   كبراح  “منادي  ”   ينادي   في الاسواق  والتجمعات   ،  كانت  الفرحة  تشع  من  عينيه    وهو  يقوم  بذلك ،بداية الاستقلال ان  يهب  الجميع  لاستقبال وملاقاة  “سيدي  السلطان  محمد  الخامس” الذي سيزور  المدينة  ،   يستوقفه  صاحب دكان قبل  ان  يسأله  يسرد عليه  برنامج  الزيارة “سيدخل مولانا  السلطان المدينة  عن  طريق  عرباوة  سيمر  بشارع سيدي  بوحمد ويتناول غذاءه  برياض   الملالي  ”

أسندت  لسيدي  احمد  مهام  اخرى  كالاعلان  عن  حملات  التلقيح  ضد  الجذري وإعلان كراء محلات  الأحباس  و حملات  تسجيل  التلاميذ  الجد ، إلا  أن حملة   التصويت على  دستور 1962 ظلت  راسخة  في  ذهنه ،كلفه  باشا  المدينة  بنفسه ان  لا  يتوقف  عن  المناداة صباح  مساء يحث  الناس   على  التسجيل  في  اللوائح  الانتخابية  ، كان  يردد حروف كلمة  الدستور  مفخمة  مؤمنا وان   كان  لا  يعرف معنى  للكلمة  انما هو  شيء فيه   الخير  للبلاد  والعباد

تذكر  للا حليمة وهي تعد له  أحسن  جلباب   تلبسه  وتعطره قبل  خروجه وهي  تشيعه إلى  الباب  وما  أن يغادر ،  تنادي  جاراتها ،”سيدي  احمد  سيحضر  حفلا  بالباشوية ”

يصل  إلى  الباشوية  يسلم  على  المخازنية  يساعد  في  إعداد  الكراسي  ، يقبل  الوفد  الرسمي  يهب  سيدي احمد مسرعا  يسلم  على  الباشا ،والكومسير   يبالغ  في  الانحناء ،يسلم  على  رئيس  المجلس سي  محمد   بوخلفة  يعانقه  لا  كلفة  بينهما ،  يسأله  عن  حليمة ويعاتبه   عن   قلة  زيارتها يتبادلان  الهمس  تتعالى  ضحكات  سي  محمد  بوخلفة  الذي  لم  يكن  يأبه  لوجود  الباشا  ، يتوارى سيدي  احمد  الى  الوراء ويتكرر  المشهد  كل  حفل .

عادت  به  الذاكرة  إلى  أصباح  القصر  الكبير  الجميلة  ،  يستفيق  باكرا يصلي  الفجر  في  الجامع  الكبير يقرا  الحزب ويصر  أن  يرافق  الإمام وهما  يغادران  الجامع يمران  بسوق صغير   يسرد  سيدي احمد   وقائع  ليلة  الأمس  كيف مرت  بسيدي احمد  الشريف أو بسيدي  قاسم  بن  زبير  أو  ليلة  فدية   أو  أي  مناسبة  ولا  يذكر  إلا  مزايا  الليلة ” كلينا  وشربنا الله  يخلف  عليهم  ”

سيدي  احمد   البراح   وكالة  أخبار  متنقلة بامتياز ،  ما  أن  تدب  الحركة  في  دروب  المدينة وشوارعها ومقاهيها  تكون  أخبار  من  ماتوا –مات  فلان  بالقطانين وآخر  بالشريعة  ،  الصلاة  على  فلان  بالزاوية  التجانية  والدفن  بسيدي  الريس فلانة  يصلى  عليها  بالجامع  الكبير  والدفن  بسبعة  رجال  –  وما  أن  يستوي  الصباح يقصد   سيدي  احمد مقهى “كافي  بلاطة  ” يسلم   على  احد  الجالسين ويجلس  إليه يخرج  مبالغ  مالية  ويقدم له  كل  مبلغ  على  حدة  ، هذا  كراء  دار  درب  سيدي  الخطيب  هذا  كراء دار  درب  الغرابلي   هذا  كراء  حانوت  الديوان  هذا  كراء  مصرية  النيارين  ودون  أن  يعد  المبالغ  يدسها  في جيبه ويناوله  مبلغا  ودون  أن  ينظر  إليه    سيدي  احمد  ” الله  يقوي  الخير  أسيدي  الحاج  ” و  يمضي  في  اتجاه  “البلاصة  ”  السوق  المركزي    يتجول بين  الجزارة   يقف  عند  الشريف  المصباحي  يسأله  كالعادة عن صحة  الأولاد  كل  باسمه مسبوقا  بسيدي  وللا ،يناوله  الشريف  المصباحي قرطاسا   به  خليط  من  الكبدة ولحم لرأس والدوارة  يأخذه  سيدي احمد  مترددا  وهو يتمتم ” والله  العظيم  أسيدي  الشريف  وجدك  المصطفى  إلا  للا  حليمة  دائمة الدعاء   لكم  ”   يمر  أمام دكان  الفاسي  يداعبه  يقلد  لكنته  الفاسية  “الجغاد طاح  فالبيغ “”  سقط  الجراد في  البئر  ” يأخذ  الفاسي  عنقود  الموز يقتطع  منه  واحدة   يناوله  إياها  يتشممها   ويدسها  في جيب  قندورته  الواسع  محتفظا  بها  لحليمة   ،  يخرج  من  البلاصا يقصد  محل  “بنيو  الحلاق ” يسلم  يرد  بنيو  السلام  وهو  منشغل برأس  زبون يجلس  على  كرسي  متآكل ينهي  بنيو  مهمته  ، يمضي  الزبون ، يتأمله  مليا ويقول  له  ” قول  للا  حليمة تتآيس  عليك راء  وليتي  صفر ”  يضحك  سيدي  احمد ويثني على  زوجته التي  لم  يرزقها  الله  الخلف

للا حليمة  مولدة  وطباخة في  الأفراح  والمآثم  ولا تتردد  في  المساهمة  في المولوديات  في  كل  زوايا  المدينة ،امرأة  دائمة  الابتسامة  مطلعة  على  أسرار  الأسر  والبيوتات  تحتفظ  بها  لنفسها  ولا  تفشيها  ،  تكلفها  بعض  الأسر بتقارير  حول  بعض  المرشحات  للزواج   ولا  تكون  نتيجة تقاريرها  إلا  ايجابيه  وكلها  ثناء  واستحسان  ، ماتت  للا  حليمة  بعد  مرض  لم يمهلها  طويلا  ،بموتها  أحس  سيدي  احمد  باليتم ،  خصوصا   بعدما  دار  الزمان  دورته لم  يعد” المخزن  السعيد”  في  حاجة  الى  خدماته

استجمع  قواه   واتكأ  على عصاه   ،لبس  بلغته   وخرج  من  منزله ،  تجاوز  صابة  القاضي   مر بالشطاوطية وعرج  على  درب  العلوج  توقف أمام  نظارة  الأوقاف     تردد  قبل  أن  يصعد  الدرجات  التي يعرفها ،طالما  صعدها  بخفة في  زياراته  المتكررة للنظارة ، يداعب  موظفيها  ، كان  الناظر  يستقبله  باشا ،  يسأله  عن الصحة  وعن  أحوال  للا  حليمة  ، ويساله  عن  وضعية  مسجد  ما عن  إمام  ما  عن  مؤذن  ما  ،   تقارير  سيدي احمد  كانت  كلها  ايجابية  عن  سلوك   الأئمة  والمؤذنين  ،  يدرك  الناظر  انه  يخفي  عنه  الكثير  من  الأحدات  التي وصلته  عبر  مخبريه   المتطوعين ،  إلا  أن  سيدي  احمد  كان يخبر  الناظر  عن  وضعية  الجوامع  ،  مسجد  الشجرة  في  حاجة  إلى  تبليط   السقف  ” خصو  الحريرة  ”   بئر  جامع  سعيدة   في  حاجة  إلى  تجديد   الدلو    يستمع  إليه الناظر   ويكلفه  بمهام  اخرى   كان  ينادي  في الناس  عن عزم  الأوقاف  كراء ارض  ما   بيع  محصول  ما  ، يمتثل  سيدي  احمد  يعرف  مهمته  ويمضي  داعيا  للناظر  بالصحة وطول  العمر . أعاد  هذا  الشريط   وهو  يهم  بالدخول  إلى النظارة    تراجع  واتكأ على  باب  مقهى  الفدائيين  المغلقة  الأبواب  ،  تحامل  وتابع  السير من حيث  أتى  درب العلوج  الشطاوطية    توقف  أمام  دكان  الحسناوي  مضى في  خطوات متثاقلة  أحس  بعرق  يتصبب  ، اتكا  على  جدار  جامع  سيدي  العربي  هم  شاب  بمساعدته   ، سقط  سيدي احمد ، مات  سيدي  احمد ..

في المساء ينشر  احد  المواقع  الالكترونية مقالا  معنونا ” مات  سيدي  احمد   المسكيني في  غفلة  منا “

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